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कुछ मूवीज ऐसी होती हैं जिनके ट्रेलर देखने के बाद ही समझ में आ जाता है कि यार ये मूवी तो वाकई में कुछ करके दिखाएगी। दरअसल जब हम एक्टर्स के रूप में बात करते हैं। संजय मिश्रा या नीना गुप्ता जैसे एक्टर्स की जो कि एक्टिंग की खदान माने जाते हैं तो फिर किसी भी मूवी के मायने वहीं बदल जाते हैं और जब पता रहता है कि ये मूवी किसी गहरे और ऐसे टॉपिक के ऊपर है जो डार्क बन जाता है कहीं न कहीं जाकर।

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तो फिर आप उस मूवी से कहीं ना कहीं कुछ ओर एक्सपेक्टेशन ही रखते हैं और वक्त को देखने के बाद भले ही उसमें थोड़ी बहुत कमियां थीं जो कि हमेशा हर एक मूवी में हो ही जाती है। उसके बाद भी कहीं न कहीं ये मूवी आपको अपने साथ कुछ इस तरीके से लेके चलती है कि आप उसकी पेस से परेशान नहीं होते। भले ही वह थोड़ी स्लो लगती है। इसके बावजूद आपकी एक्सपेक्टेशन इतनी अलग ही रहती हैं कि आप मुकाम तक पहुँच ही जाते हैं और ये मूवी आपको निराश भी नहीं करती।

संजय मिश्रा और नीना गुप्ता हमेशा से एक्टिंग के मामले में नायाब रहे हैं। ये और बात है कैरेक्टर आर्टिस्ट से मशीन आर्टिस्ट के रूप में नजर आने में उन्हें वक्त लगा। मगर ये एक अच्छा पहलू भी है कि अब इनके लिए खासतौर पर भूमिकाएं लिखी जाने लगीं। निर्देशक जसपाल सिंह की कहानी वह भी एक ऐसे बुजुर्ग दम्पति की कहानी है जहां हीरो हीरोइन दोनों ही अधेड़ हैं। दिलचस्प बात ये है कि रिश्तों के ताने बाने में उलझी कहानी नहीं।

ये कहानी है शंभूनाथ मिश्रा। मतलब संजय मिश्रा की जो 0 में निहारते हुए कहता है कि हमने हत्या नहीं वध किया है जो स्कूल मास्टर किसी बच्चे को थप्पड़ मारने पर भी 300 नहीं पाता। वो किसी के गले में चाकू मार कर उसे मारने का दुस्साहस आखिर कैसे कर सकता है और क्यों इसी क्राइम और थ्रिल के इर्दगिर्द इस मूवी की कहानी घूमती रहती है। इसका नाम है वेद। अगर बनी हुई कहानी की बात करें तो कहते हैं कि पहले क्राइम जैसी चीज अपराध जगत में संभव नहीं।

बलवंत की कहानी अपराध के ऐसे फुलप्रूफ प्लान पर आधारित है जिसमें अपराधी और पीड़ित के बीच की रेखा कहानी के आखिर तक आते आते धुंधली हो जाती है। शम्भूनाथ मिश्रा एक बेहद ही खुद्दार सेवानिवृत्त स्कूल मास्टर हैं। मनोहर कहानियों के शौकीन जमुना की पत्नी मंजू मिश्रा घुटनों बीमारी से पीड़ित हैं। ये दंपति विदेश में बेटे गुड्डू की उच्च शिक्षा और उसे सेटल करने के लिए स्थानीय गुण्डे प्रजापती पांडे मोहल्ला के सौरव सचदेवा ने किरदार निभाया है जो मोटे ब्याज पर एक बड़ी रकम उधार लेता है।

पाण्डे जब भी वसूली के लिए आता है, रमन परिवार के घर न केवल शराब और मांस लेकर उसका सेवन करता है बल्कि लड़कियों को लेकर अय्याशी भी करता है। प्रताड़ित शम्भूनाथ मजबूरी से अपमान का घूंट पीकर रह जाता है। पाण्डेय से अपमानित होने वाला मुन्ना विदेश में बस चुके बेटे गुड्डू की घोर उपेक्षा का शिकार भी होता है और इसके बावजूद जिन्दगी से शिकवा नहीं रखता। अपनी पत्नी से प्रेम करता है। पड़ोस के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता है। मगर एक दिन हालात ऐसे बनते हैं कि उसके सब्र का बांध टूट जाता है और वो पाण्डे को मार देता है। उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं। क्योंकि उसका मानना है कि असुरों का वध किया जाता है और पाण्डे भी एक ऐसा ही असुर था। इस बात को वो इस तरह से फुलप्रूफ प्लानिंग में बदल देता है कि उसका पकड़ा जाना लगभग असंभव सा है।

मगर कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब पुलिस अफसर जिसका किरदार मानव विज ने निभाया है और इलाके का विधायक जसपाल सिंह संधू भी अपनी पोल खुल जाने के डर से पांडे की मौत का सुराग ढूंढने लग जाते हैं। क्या पुलिस और विधायक जमुना के परफेक्ट क्राइम में लूपहोल्स का पता लगाकर उसे जेल पहुंचा पाते हैं। ये जानने के लिए आपको इस बेहतरीन मूवी को देखना पड़ेगा। निर्देशक और लेखक राजीव ने इस क्राइम थ्रिलर को ग्वालियर में बुना है और एक आम आदमी के खास हालात में पड़कर क्राइम का सहारा लेना फिल्म विशेषता है। फिल्म का पहला भाग काफी ज्यादा सुस्त है।

किरदारों को स्थापित करने की कवायद लंबी हो जाती है और दूसरे भाग में कहानी जोर पकड़ती है। शहर में निर्देशक चरित्रों के जरिये छोटे शहर की आर्थिक और सामाजिक विडंबनाओं को भी दर्शा लिए जाते हैं। कहानी में हल्के फुल्के कॉमिक पल भी हैं। हत्या के बाद उसके टुकड़े करने की वीभत्सता को बैकग्राउंड म्यूजिक और आवाज के जरिए बताया गया है जो कि काफी ज्यादा रोंगटे खड़े कर देने वाला है। चूहे को चूहेदानी में पकड़ने वाला सीक्वेंस प्रतीकात्मक है जो चरित्र की पैनी सोच को दिखाता है। सपन नरूला की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है।

ग्वालियर की गलियों में से लेकर कुछ ऐतिहासिक जगहों तक उन्होंने शहर को बखूबी अपने कैमरे में उतारा है। साथ ही बैकग्राउंड म्यूजिक भी दमदार है। मगर थ्रिलर एलिमेंट थोड़े से कम ये फिल्म बहुत हद तक आपको दृश्यम की याद दिलाती है और रिपोर्ट पर अगर कहानी थोड़ी प्रैक्टिकल भी हो जाती लेकिन आखिर में आपको ये कहानी सुकून की सांस जरूर देगी। फिल्म में अभिनय के जो दो मजबूत स्तंभ काम करते हैं वो संजय मिश्रा, नीना गुप्ता एक रिटायर्ड स्कूल मास्टर की बेचारगी से लेकर उसके गुस्सा होने तक का जो ट्रांसफॉर्मेशन है वो संजय मिश्रा के अभिनय के लाजवाब ग्राफ को दर्शाता है। नीना गुप्ता ने घुटनों के दर्द से परेशान धर्मभीरू महिला के किरदार में प्राण फूंक दी।

उनकी चाल ढाल का ढाल बन किसी अपने को याद दिलाता है। पति पत्नी के रूप में उनकी केमिस्ट्री है। वो कमाल की पुलिस अफसर के रूप में मानव विज जंचे हैं। वहीं सौरभ सचदेवा को पांडे के रूप में देखना हद से ज्यादा गुस्सा दिलाता है और यही उनकी ऐक्टिंग की खूबी भी और ये किरदार भी अच्छे हैं। अब अगर बात करें कि मुझे मूवीज क्यों देखना चाहिए? तो अगर आप थ्रिलर के शौकीन हैं और संजय मिश्रा, नीना गुप्ता जैसे अदाकारों के अभिनय को देखना पसंद करते हैं। मतलब की इन यूटीलिटी आपको ऐसी मूवी पसंद है जिसको देखकर आपको ऐसा महसूस ना हो कि भैया ने क्या देखी बल्कि आप कैसे लगे। हमने क्या देख लिया तो आपको ये मूवी जरूर देखनी।

जाइए क्योंकि ये मूवी वाकई में आपको बांधे रखेगी। किया नहीं। अब तो कुछ होने वाला और आपको सबकुछ पता होगा लेकिन उसके बावजूद भी जिस तरीके से कहानी चली आपको लेटर लिखा जाएगा तो इस मूवी को जरूर देखें। इस मूवी को देखने के ये कारण भी हैं कि आप ऐसे एक्टर्स को सेलिब्रेट करेंगे जो नाम बड़े प्रदर्शन छोटे वाला काम नहीं करते हैं। मेरे साथ नहीं गए हैं।

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Kundansoorya

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